वृद्धाश्रम के महत्व: वर्तमान भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में
(Importance of The old Age Home: In present Indian Sociological aspect)
सत्यनारायण कुमार दास
पी-एच0 डी0, समाजशास्त्र विभाग, ल0 ना0 मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा-846004, बिहार, भारत ।
*Corresponding Author E-mail: sonubibha467@gmail.com
ABSTRACT:
भारत में वृद्धाश्रम अब तक बड़े-बड़े नगरों में ही स्थापित किये जाते रहे है, परंतु अब इसकी आवश्यकताएँ छोटे शहरो एवं कस्बायी नगरों में भी महसूस की जाने लगी है। वृद्धो की बढ़ रही समस्याओं ने आज वृद्धाश्रम जैसे सामाजिक महत्व के संस्थाओं की आवष्यकताओं को कई गुणा और बढ़ा दिया है । आज वृद्धाश्रम जैसे संस्था ने वृद्धजनो के जीवन में जीने की उम्मिदो को बढ़ा दिया है ।
KEYWORDS: वृद्धाश्रम, महत्व: वर्तमान भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य
INTRODUCTION:
आज के इस बदलते सामाजिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक परिवेशो के कारण बुजुर्गो की संख्या जिस तरह से बढ़ी है, उसी तेजी से बुजुर्गो की समस्या भी बढ़ती जा रही हैं। परिवार में बुजुर्गो को एक समस्या या बोझ समझने के कारण उनके सामाजिक परिस्थिति में काफी बदलाव आया है। वे अपने ही परिवार में अपनों के बीच उपेक्षा एवं वहिष्कार का शिकार हो रहे है । वे अपनी गाढ़ी कमाई व अपनी मेहनत से बनायी अपने ही घर से अपनो के द्वारा बेदखल हो ठोकरे खाने को विवश व लाचार है, इस परिस्थिति में समाज में ”वृद्धाश्रम” (Old age home) जैसे संस्थाओं का खुलना वृद्धों के लिए एक वरदान सावित हो रहा है । वृद्धाश्रम जैसे संस्थाओं में प्रशिक्षित नर्स, डॉक्टर, थेरोपिस्ट एवं कर्मचारियों की सुविधा उपलब्ध होती है। वृद्धाश्रम में समय से खाना-पीना, रहना एवं उचित देखभाल की सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं । वृद्धाश्रम मे रहने वाले बुजुर्गों को आपस में एक सामाजिक जुड़ाव के साथ-साथ एक हम उम्र मित्रमंडली भी उपलब्ध हो पाती है । यहॉ पर स्त्री एवं पुरूर्षो दोनो के लिए अलग-अलग व्यवस्थाए होती है । यहॉ बुजुर्गो को आरामदायक जीवन शैली, तनावमुक्त माहौल मिल पाते है । यहॉ इन्हे उचित चिकित्सकिय सुविधा के साथ-साथ समय से दवाएं एवं अन्य सभी सामग्रियॉ उपलब्ध हो पाती है । यहॉ पर बुजुर्गों के लिए आउटडोर एवं इनडोर जैसे खेलों के साथ-साथ मनोरंजन व पूजा-पाठ आदि की भी सुविधाए उपलब्ध होती है । यहॉ इन्हें एक घर जैसा ही वातावरण उपलब्ध हो पाता है ।
कार्यक्षेत्र:-
भारत एक संस्कृति समृद्ध राष्ट्र है जहॉ की संस्कृति हजारों साल पुरानी है जो आरंभ से ही चली आ रही है । हमारे समाज में परिवार (संयुक्त परिवार) का बड़ा महत्व रहा है और संयुक्त परिवार में परिवार के प्रधान के रूप में हमेषा बड़े-बुजुर्ग रहे है । भारत में सामाजिक मूल्य रहा है कि परिवार में बड़े-बुजुर्गो का देवता के बाद दुसरा स्थान होता है । परिवार में युवा वर्ग जब भी कोई नया कार्य या आयोजन का आरंभ करने चलता है तो वे सबसे पहले अपने बड़े-बुजुर्गो से सलाह-मशवरा एवं उनका आशीर्वाद लेना नही भुलता, परिवार में वृद्धों को अनुभवों एवं ज्ञान का पिटारा समझा जाता है ।
आज सम्पूर्ण विष्व का भूमण्डलीकरण हो जाने के कारण आद्योगिकरण, नगरीकरण आदि का तेजी से विस्तार हुआ है, जिस कारण भारतीय समाज एवं संस्कृति में भी तेजी से बदलाव आया है । आज संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार का महत्व तेजी से बढ़ा है, जिसमें बुजुर्गो का कोई स्थान नही रहा । आज युवा वर्ग प्रायः अपने बुढ़े माता-पिता को गॉव अथवा अपने पुराने घर पर ही छोड़कर नगरो एवं महानगरों में रोजगार हेतु पलायन कर जाते है, फिर लम्बे समय तक रह वे वही बस जाते है । गॉव में घर पर बुजुर्गों का उचित देख-भाल एवं उनका सेवा-सत्कार करने वाला कोई नही होता है, इस स्थिति में बुजुर्ग अपना एकाकी जीवन तनाव में व्यतित करने को विवष हो जाते है । उन्हे तरह-तरह के मानसिक व शारीरिक पीड़ा झेलना परता है ।
स्वतंत्रता प्राप्ती के बाद से देश में हुए विकास एवं विज्ञान के क्षेत्र में हुए नित्य नये खोज एवं प्रगति ने स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में भी काफी प्रगति किया है, जिस कारण व्यक्ति के जीवन प्रत्यासा अथवा औसत आयु में काफी सुधार हुआ है । स्वतंत्रता से पूर्व प्रति व्यक्ति औसत आयु 29 वर्ष मात्र थी, जो निरंतर विकास करता हुआ स्वतंत्रता के वाद 1960 में 41.38 वर्ष, 1980 में 55.38 वर्ष, 2000 में 62.16 वर्ष आयु थी । वर्ष 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार पुरूषों की जीवन प्रत्यासा (औसत आयु) 62.03 वर्ष जबकी महिलाओ की औसत आयु 63.09 वर्ष थी । वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार पुरूषो की औसत आयु 67.03 वर्ष एवं महिलाओं की औसत आयु 69.06 वर्ष हो गई है, जबकी वर्ष 2024 तक प्रति व्यक्ति औसत आयु 72.02 वर्ष हो चुकी है, इसमें पुरूषो की औसत आयु 70.07 वर्ष एवं स्त्रियों की औसत आयु 73.09 वर्ष हो चुकी है । भारतीयों की जीवन प्रत्यासा में हुई इस वृद्वि के कारण देश में 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों की संख्या में काफी वृद्वि हुई है ।
वर्ष 2001 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार देश में वृद्वों की कुल आबादी 7.6 करोड़ थी जो, बढ़कर 2011 की जनगणना रिपोर्ट के आनुसार 9.8 करोड़ हो गई है । देश में बुजुर्गो की इतनी बड़ी संख्या होने के कारण इनकी समस्या भी बढ़ती जा रही है । भारत सरकार के एक अधिकारिक आकलनों के अनुसार आज देश में 85 प्रतिषत से अधिक बुजुर्ग आर्थिक रूप से अपने बच्चों (बेटे-बहु) पर निर्भर रहते है, जबकि 02 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग इनसे आगे की पीढ़ी अपने नाती-पोतों पद निर्भर है, एवं शेष बुजुर्गो की आबादी अन्य सहारो पर निर्भर रहते है । भारत में 75 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग ग्रामीण इलाको में एवं शेष बुजुर्ग नगरों में रहते है । देश में एक तिहाई से अधिक बुजुर्ग गरीबी रेखा से निचे (BPL) जीवन यापन करते है । ग्रामीण बुजुर्गो की समस्या शहरी बुजुर्गों की अपेक्षा में काफी जटील है ।
बुजुर्गो की सबसे बड़ी समस्या होती है, बढ़ती उम्र के कारण उनके शारीरिक शक्ति का क्षरण होना एवं आर्थिक रूप से अपने बच्चों पद निर्भर हो जाना । बढ़ती उम्र के कारण बुजुर्ग अनेक प्रकार के गम्भीर रोगों जैसे अल्जाईमर, ऑर्थ्राइटिस, डिमेंशिया, पार्किंसन, अनिंद्रा, दृष्टिदोष, सूगर, बी0पी0, हार्ट, कैंसर इत्यादि जैसे कई अनेको गम्भीर रोगो के शिकार होने लगते है, जिस कारण इनके सोच एवं व्यवहार में परिवर्तन होने लगते है । इनके यवहार में होने वाले इन परिवर्तनों के कारण इन्हे इनके नई पीढ़ी के लोगों के साथ ताल-मेल नही बैठ पाता है, जिस कारण उनके साथ शारीरिक, मानसिक एवं कई अन्य प्रकार के उत्पीड़न की संख्या में बढ़ोतरी होती रहती है ।
बुजुर्गों को उनके बच्चों या उत्तराधिकारियों के द्वारा प्रतारित या दुर्व्यवहार किये जाने अथवा उनका देख-भाल न करने एवं उन्हे अपमानित किये जाने से क्षुब्ध होकर वे स्वयं भी अपने घर को छोड़कर चले जाते है । अथवा उनके बच्चे भी उन्हे घर से निकाल देते है, ऐसी स्थिति में वे सड़को पर भटकते है, भिक्षाटन करते है, या किसी मंदीर-मठो में रह कर अपना गुजर-बसर करने को विवष होते है । कभी-कभी वे अत्यधिक क्षुब्ध होकर आत्महत्या भी कर लेते है इन सारी परिस्थितियों पर नियंत्रण लगाने में सक्षम संस्था है, वृद्धाश्रम ।
कानूनी प्रावधान:-
आज देश में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के कारण समाज में कई प्रकार के पारिवारिक समस्याएं उत्पन्न हो रही है । युवा पीढ़ी के लोग इसे एक समस्या के रूप में ले रहे है, वे अपने बुजुर्गो का ध्यान सही से नही रख पा रहे है न ही इनका आदर करते हैं। कभी-कभी तो बुजुर्गों के साथ मार-पीट व प्रताड़ना तक के मामले सामने आते है। भारत सरकार ने बुजुर्गो की सुरक्षा एवं उनके देख-भाल हेतु तथा बुजुर्गो के साथ होने वाले दुर्व्यवहार एवं अन्य अपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए वर्ष 2007 में एक विधेयक लाकर कानून बनाया, यह कानून था -”माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम-2007” (The Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act-2007) यह कानून भारत सरकार ने बुजुर्गों या वरिष्ठ नागरिकों के आत्मसम्मान एवं शांति से जीवन यापन करने के लिए उनके बच्चों और परिजनों पर कानूनी जिम्मेदारी डालता है ताकि वे अपने बुजुर्गो को सम्मानजनक तरीके से सामान्य जीवन-यापन करने दे। इस कानून के साथ-साथ प्रत्येक राज्य सरकारों को बुजुर्गो के देख-रेख और कल्याण प्रभवी तरिके से हो सकें इसके लिए राज्य के प्रत्येक जिलो में वृद्धाश्रम (Old age home) जैसे बहुमहत्वकांक्षी संस्थाएँ खोलने हेतु प्रेरित किया गया है । उपरोक्त कानून के अन्तर्गत देश के वैसे प्रत्येक नागरिक जो 60 वर्ष की उम्र सीमा पार कर चुकें है, जो स्वयं अपना पालन-पोषण करने में सक्षम नही है, वे अपने पालन-पोषण के लिए अपने आश्रित या अपने उत्तराधिकारी अथवा अपने व्यस्क बच्चों से अपने मेंटेनेंस के लिए उचित आहार (भोज्य पदार्थ), आश्रय, कपड़ा, चिकित्सा इत्यादि लेने के हकदार है, ताकि उन बुजुर्गो का शेष जीवन सामान्य तरह से गुजर सकें । इस कानून के तहत उत्तराधिकारी बुजुर्गो के गोद लिया हुआ या सौतेला या अपने सहोदर में से कोई भी हो उनसे सामान्य जीवन यापन हेतु आवष्यक चीजे धन या अन्य सामग्री प्राप्त करने के वैधानिक हकदार है ।
ऐसे बुजुर्ग जिनके अपने बच्चे नही होते है या जो 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकें है, उनके साथ दुर्व्यवाहर, उनका उत्पीड़न, उनके भरण-पोषण में कमी एवं अन्य किसी भी परेशानी होती है, तो अपने मेंटेनेंस हेतु अपने वैसे उत्तराधिकारी जिसको उनके मृत्यु पश्चात् उनकी संपत्ति का कानूनी हक मिलने वाला होता है । ऐसे उत्तराधिकारी से संबंधित पिड़ित बुजुर्ग स्वयं या अपने द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति के माध्यम से आवेदन दे सकते है । इसके लिए इस कानून के तहत बनाए गये न्यायाधिकरण या ट्रिव्यूनल तभी बनते है। जब यह स्पष्ट हो जाता है कि बुजुर्गो के साथ उनके बच्चें या उनके उत्तराधिकारी के द्वारा भरण-पोषण अथवा मेंटेनेंस से संबंधित किसी प्रकार की लापरवाही या अनदेखी हुई हो, तो ट्रिव्यूनल उन कानूनन उत्तराधिकारी या उनके बच्चों को भरण-पोषण हेतु 10,000/- (दस हजार) रूपये मासिक गुजारा भत्ता के रूप में देने के लिए वाध्य होना पड़ता है, इस प्रक्रिया हेतु किसी वकील की भी कोई आवश्यकता नही होती है । इस आदेश को नही मानने पर वैसे बच्चें या उत्तराधिकारी को 3 (तीन) माह कैद या 5,000/- (पॉच हजार) रूपये जुर्माना अथवा दोनो हो सकता है।
देश में विभिन्न धर्मो के अन्तर्गत धार्मिक कानून में भी इस तरह के प्रावधान मैजूद है, जैसे- हिन्दु धर्म में हिन्दु दत्तक एवं देख-रेख कानून-1956 में भी यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने भरण-पोषण एवं मेंटेनेंस अपने बच्चों से प्राप्त करने का पूरा कानूनी अधिकार है ।
मूस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसारइस्लाम धर्म में भी बुजुर्गो या वालदेन को अपने बच्चों से अपना गुजारा भत्ता पाने को पुरा हक है ।
ईसाई और पारसियों मे भी इसी प्रकार से बुजुर्ग अपने मेंटेनेंस के लिए अपने बच्चों या उत्तराधिकारियों से सन् 1973 में बनाये गये मेंटेनेंस कानून के तहत आवेदन देकर अपना गुजारा भत्ता अपने बच्चों या परिजनों या अपने उत्तराधिकारियों से प्राप्त कर सकता है ।
सरकारी योजनाएँ:-
केन्द्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों ने बुजुर्गो के लिए कई प्रकार की सरकारी योजनाएं लागू की है, जैसे स्वास्थ्य सूरक्षा, सामाजिक सूरक्षा एवं कई अन्य प्रकार के कल्याणकारी योजनाएं लागू की है ।
केन्द्र सरकार ने सन् 1999 में एक राष्ट्रीय नीति लाई जिसमें 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को वरिष्ठ नागरिक माना गया एवं इसके अनुसार ही वरिष्ठ नागरिक या बुजुर्गो के देख-रेख तथा उसकी सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकारी तथा गैरसरकारी संगठनों के माध्यम से पोषण, आश्रय, शिक्षा, कल्याण, जीवन एवं सम्पति की सुरक्षा के लिए कई नीतियॉ लागू की गयी है, जैसे –
· इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना- इसके अन्तर्गत अब प्रत्येक बुजुर्गो जो 60-79 वर्ष के है को 200 (दो सौ) रूपये प्रति माह एवं 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गो को 500/- (पॉच सौ) रूपये प्रति माह देने का प्रावधान है, बढ़ती महंगाई के कारण बुजुर्गो को इतने कम आर्थिक सहायता नकाफी साबित हो रहा है। परंतु सरकार द्वारा वर्तमान में इनके पेंशन की राशि में कुछ बढ़ोतरी की है ।
· इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना-इसके अन्तर्गत सभी गरीब परिवार के विधवा स्त्रियों को सरकार के द्वारा आर्थिक सहायता करने के लिए उन्हे मासिक 500 (पॉच सौ) रूपये प्रति माह देती है ।
· आयुष्माण भारत योजना- इसके अन्तर्गत सभी गरीब परिवार के बुजुर्ग लोगों को 5 लाख रूपये तक का मुफ्त चिकित्सा सुविधा का लाभ दिया जाता है ।
· अन्नपूर्णा योजना-इसके अन्तर्गत सभी गरीब परिवार के बुजुगों (BPL परिवार) को प्रत्येक माह निःशुल्क 10 कि0लो0 अनाज दिया जाता है ।
इसके अतिरिक्त और भी कई अन्य लाभकारी योजनाएं संचालित है, जैसे -
· इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय निःशक्तता पेंशन योजना -
· प्रधानमंत्री व्यवंदन योजना -
· प्रधानमंत्रीजन आरोग्य योजना-
· अटल वयोवृद्ध अभ्युदय योजना -
· लक्ष्मीवाई सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना -
· मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना -
· बिहार निःशक्तता पेंशन योजना -
· वरिष्ठ नागरिक बचत योजना -
निष्कर्ष:-
बुजुर्गो की दिनो-दिन बढ़ती समस्याओं ने सरकार एवं समाज दोनो को इनके समस्याओं के समाधान हेतु प्रेरित किया है तथा इसी से प्रभावित होकर दुनिया के प्रत्येक सरकार प्रति वर्ष 01 अक्टुवर को अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाती है । भारत जैसे विकासशील एवं तेजी से बदलते परिवेश वाले देश में वृद्धों की ऐसी अनेको समस्याओं को देखते हुए सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के पहल से “वृद्धाश्रम” (Old age home) जैसे बहुआयामी संस्थाओं की स्थापना होनी चाहिए । इसकी आवश्यकता आज शीघ्रता से महसूस की जा रही है । जो वृद्धों के दुःखी मर्म पर एक कोमल सहयोग के समान होगा ।
भारत में वृद्धाश्रम अब तक बड़े-बड़े नगरों में ही स्थापित किये जाते रहे है, परंतु अब इसकी आवश्यकताएँ छोटे शहरो एवं कस्बायी नगरों में भी महसूस की जाने लगी है। वृद्धो की बढ़ रही समस्याओं ने आज वृद्धाश्रम जैसे सामाजिक महत्व के संस्थाओं की आवश्यकताओं को कई गुणा और बढ़ा दिया है। आज वृद्धाश्रम जैसे संस्था ने वृद्धजनो के जीवन में जीने की उम्मिदो को बढ़ा दिया है। वृद्धाश्रम में बुजुर्गो को घर जैसा वातावरण रहने एवं आराम करने की सारी व्यवस्थाएं होती अै यहॉ उन्हे चिकित्सकिय सुविधा के साथ-साथ समय से दवाएं एवं अन्य जरूरत के सभी सामग्री उपलब्ध हो पाती है । वृद्धाश्रम में बुजुर्गो को समय से भोजन एवं उनके देख-भाल की सारी सुविधाएँ उपलब्ध हो पाती है, यहॉ पर उन्हे सामाजिक जुड़ाव के साथ-साथ एक मित्रमंडली भी मिल जाती है । यहॉ उनका जीवन तनाव मुक्त एवं आरामदायक हो जाता है । यहॉ बहुत कुछ उन्हे अपनापन जैसा महसूस होता है । वृद्धाश्रम जैसे संस्थाओं से वृद्धों के जीवन के एक दिन में बढ़ोतरी तो नही किया जा सकता है, पर उनके जीवन के एक-एक दिन में जीने योग्य जीवन को अवश्य भरा जा सकता है ।
संदर्भ ग्रंथो की सूचि:-
1. Aging and K- S- Rao, Nationl book trust- 1997
2. क्रॉनिकल, (मासिक पत्रिका), सितम्बर-2010, पृष्ठ सं0-80, 82
3. हिन्दुस्तान, (दैनिक समाचार-पत्र), दिनांक-21.09.2011 एवं 01.10.2011
4. प्रभात खबर, (दैनिक समाचार-पत्र), दिनांक-21.09.2011 एवं 01.10.2011
5. जनगणना रिपोर्ट-2001 एवं 2011
6. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार की बेवसाईट
7. युनाईटेड नेशंस का आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (भारत अंक) का वार्षिक रिपोर्ट-2024
8. सेनोकेयर (पत्रिका) - 18.04.2024 अंक
|
Received on 30.12.2025 Revised on 22.01.2026 Accepted on 10.02.2026 Published on 20.03.2026 Available online from March 23, 2026 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(1):69-73. DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00012 ©A and V Publications All right reserved
|
|
|
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License. Creative Commons License. |
|